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![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | प्रफुल्ल कोलख्यान की कविता - प्रफुल्ल कोलख्यान चिता की लपट मद्धम न पड़ जाये और उजाला किये जाने का भरम बना रहे इसका ख्यालकर तेजी से सुलगाये जा रहे हैं जंगल Keywords: कोलख्यान; kolkhyan Downloads: 4 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | व्यक्ति, समाज और साहित्य - प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan समाज द्वारा प्रदत्त साहस की सीमा-रेखा से बाहर जाकर किये जानेवाले आचरण को ही समाज अपराध करार देता है। वस्तुत: समाज विरोधी आचरण का भी एक सामाजिक पहलू होता है। समाज और व्यक्ति का चुंबकीय संबंध दो... Keywords: kolkhyan,कोलख्यान Downloads: 39 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | गुजरात के गाँधी और अयोध्या के राम - प्रफुल्ल कोलख्यान राम को अयोध्या और गाँधी को गुजरात में सीमित करना स्थानीयकरण की प्रक्रिया का ही प्रकार्य तो नहीं है! कहीं हम अपनी मासूमियत में राम और गाँधी जैसे जनता के चित्त-नायक के विसर्जन और बाजार के वित्त-... Keywords: कोलख्यान; kolkhyan Downloads: 18 Average rating: (1 review) |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | भाषा में भ्रांति - प्रफुल्ल कोलख्यान (Prafulla kolkhyan) भाषा सामाजिकता की जीवनी शक्ति और सौंदर्य-शक्ति को भी सुगठित और संरक्षित करती है। लक्षित किया जा सकता है कि कैसे एक भाषा के गर्भ में पलती हुई दूसरी भाषा उससे बाहर निकलकर एक नये भाषिक प्रस्थान क... Keywords: कोलख्यान,Kolkhyan Downloads: 10 Average rating: (1 review) |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | अच्छी हिंदी - प्रफुल्ल कोलख्यान मेरी हिंदी बहुत ही कमजोर थी। आज भी बहुत मजबूत होने का दावा नहीं है। लिखने में बहुत ही अशुद्धियाँ हुआ करती थीं। अशुद्धियाँ आज नहीं होती हैं, ऐसा नहीं है। लेकिन पहले होनेवाली अशुद्धियों की तुलन... Keywords: kolkhyan,कोलख्यान Downloads: 27 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | अपने वतन में पराए - प्रफुल्ल कोलख्यान (Prafulla kolkhyan) अपने मूल भाषा-क्षेत्र से बाहर रह कर छोटे-मोटे रोजगार और खुदरा कारोबार में लगे लोगों को निकृष्टतम अर्थों में अपने ‘बाहरी’ होने का भारी दबाव झेलना पड़ रहा है। ऐसा लगता है कि राज्य सरकारों की निग... Keywords: कोलख्यान,kolkhyan Downloads: 32 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | किसने कहा जय किसान - प्रफुल्ल कोलख्यान आज स्कूलों में न तो प्रार्थना है, न संविधान की प्रस्तावना के हम लोग और न ही भारत माता। न तो बच्चों के मन में उस प्रकार की जिज्ञासा है और न ही परिवार में उस दादी माँ के लिए कोई जगह है जिसमें अपने क... Keywords: कोलख्यान; kolkhyan Downloads: 11 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | भिखारी सारी दुनिया - प्रफुल्ल कोलख्यान बाहर बहुत तेजी से फैलते हुए बाजार का विचार हमें गरीब और भीतर का बेलगाम लालच भिखारी बना रहा है। ऐसा लगता है कि सचमुच सारी दुनिया भिखारी हो गयी है। ऐसे में महात्मा गाँधी की याद आना सहज स्वाभाविक ... Keywords: कोलख्यान; kolkhyan Downloads: 22 Average rating: (1 review) |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | चिढ़ का चौताल - प्रफुल्ल कोलख्यान अधिक पढ़े-लिखे आदमी का इतिहास से जो रिश्ता होता है, कम पढ़े-लिखे का वही नाता किंवदंतियों से होता है। कम पढ़ा-लिखा आदमी किंवदंतियों की चरितकथा की छानबीन में अपना वक्त जाया नहीं करता, प्रेरणा ले... Keywords: कोलख्यान; kolkhyan Downloads: 7 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | ओनामासीधं - प्रफुल्ल कोलख्यान बचपन में हमलोग ओनामासीधं गुरूजी खसला -- गिर पड़े -- चितंग कहकर अपने गुरूडमयुक्त साथी के साथ ठट्ठा किया करते थे। बाद में जाना कि असल में ‘ऊँ नम: सिद्धम’ ही जनविमुख होकर अंतत: ‘ओनामासीधं’ के रूप मे... Keywords: कोलख्यान; kolkhyan Downloads: 7 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | दुविधा में नीलू - प्रफुल्ल कोलख्यान गरीब के घर की दीवारें कच्ची होती है। दीवारों के किसी कमजोर हिस्से को धराशायी करती हुई खुशियाँ निकल भी जाती है। यह नहीं कि हर बार ऐसा ही होता है लेकिन अधिकतर बार ऐसा ही होता है। ऐसा है यह दुश्चक्... Keywords: कोलख्यान; kolkhyan Downloads: 7 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | भय और भरोसा - प्रफुल्ल कोलख्यान मनुष्य भूत से डरता है और भगवान पर भरोसा कर अपने भय को काबू में करने की कोशिश करता रहा है। लेकिन जब भूत ही भगवान बनकरसामने आ जाये तो? जो सामाजिक शक्ति और संगठन भरोसा का आधार बनाते थे वे सामाजिक शक... Keywords: कोलख्यान; kolkhyan Downloads: 7 |  |
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![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | चिढ़ का चौताल - प्रफुल्ल कोलख्यान चिढ़ना व्यक्तिगत भी होता है और सामाजिक, सामुदायिक, दलीय भी। सुना है, मिथिलांचल के एक गांव के निवासी ‘चटनी-पापड़’ कहने से बुरी तरह चिढ़ते हैं। एक सज्जन बड़े लजालू ढंग से बता रहे थे कि उनके मुहल्... Keywords: कोलख्यान; चिढ़; हिंदी; kolkhyan Downloads: 3 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | अपने मोर्चे पर मरने की जिद्द - प्रफुल्ल कोलख्यान .... घर के बदले पहुँच गया अजायब घर। डेढ़ दो घंटे तक घूम-फिर कर देखने के बाद मन कुछ हल्का था। और था यह एहसास कि किन-किन मुश्किलों का सामना करते हुए, उन पर अपने ढंग की विजय हासिल करते हुए मनुष्य आज तक क... Keywords: kolkhyan; hindi; कोलख्यान Downloads: 3 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | प्रफुल्ल कोलख्यान की कुछ कविताएँ - प्रफुल्ल कोलख्यान Prafulla Kolkhyan Ki Kavitayen. Keywords: kolkhyan,कोलख्यान,कविता; hindi Downloads: 8 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | दूर के रिश्तेदार - प्रफुल्ल कोलख्यान झुर्रियों की लिपि दर्द की भाषा पढ़ने की कोई तरकीब होती या रिश्तों की दूरी मापनेवाला कोई फीता होता तो कोई बड़ी आसानी से नाप ले सकता कि मैं और मेरे जैसे बहुत सारे बेटे अपने-अपने माँ-बाप के कितने द... Keywords: कोलख्यान,हिंदी,kolkhyan,hindi Downloads: 23 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | लोकतंत्र का चेहरा, चरित्र और सिविल सोसाइटी - प्रफुल्ल कोलख्यान यह सच है कि वर्तमान लोकतंत्र अपर्याप्त है लेकिन अपरिहार्य भी है, कम-से-कम अभी तो अपरिहार्य ही है। अपर्याप्त का अपरिहार्य होना पूँजीवाद के मर्म से निकले आधुनिक लोकतंत्र की न सिर्फ विडंबना, बल्... Keywords: कोलख्यान; अण्णा; kolkhyan; anna Downloads: 17 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | इनकार का हक और हक का इनकार - प्रफुल्ल कोलख्यान मकान बनाने की ललक बढ़ी है। घर बसाने की ईहा कम हुई है। तलाक की घटना की संख्या में चिंतनीय वृद्धि हुई है। इन्हें जीवन-यापन में स्थायित्व के अवसरों की कमी से भी जोड़कर देखा जा सकता है। ...... Keywords: कोलख्यान; हक; इनकार; kolkhyan Downloads: 14 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | त्यौहार का तर्क - प्रफुल्ल कोलख्यान त्यौहार संघर्ष और संतोष, आकांक्षा और उपलब्धि की अंतराल-भूमि पर वह बाग बनकर आता है जहाँ मनुष्य अपनी पीठ पर से सुख-दुख समेत उपलब्धियों की गठरी को उतार कर अपनी आँख में सपनों के पुनर्भव होने के एहस... Keywords: कोलख्यान; kolkhyan; हिंदी Downloads: 9 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | आलोचना और समाज - प्रफुल्ल कोलख्यान समाज में पहले से व्याप्त यौनमूलक भेद-भाव और शोषण का सहारा लेकर विकृतिकरण का यह प्रयास अधिक समतामूलक दीखने और अपनी वैधता साबित करने में सफल हो जाता है।... बाजार, धर्म, काम और भाषा की आत्मिक संश्ल... Keywords: कोलख्यान; समाज; आलोचना; kolkhyan Downloads: 14 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | प्रफुल्ल कोलख्यान की कुछ कविताएँ - प्रफुल्ल कोलख्यान इसके पहले कि अखबार में कोई नया लीड आयेमैं जल्दी-से-जल्दीकिलकते हुएबच्चों को चूम लेना चाहता हूँ। Keywords: कोलख्यान; कविताएँ; kolkhyan; hindi Downloads: 17 |  |
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![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | प्रार्थना और प्रहार - प्रफुल्ल कोलख्यान प्रार्थना प्राण का कवच नहीं बन सकती। प्रार्थना चाहे जितनी विशिष्ट क्यों न हो वह अंतत: रिरियाहट ही होती है। एक ऐसी रिरियाहट जिसकी कोख में पलती रहती है बर्बरता। किसी कल्पित देवता के मने रिरिया... Keywords: कोलख्यान; प्रार्थना; kolkhyan Downloads: 15 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | ढलती उम्र में मन की उठान - प्रफुल्ल कोलख्यान अपनी भौतिक परिस्थतियों के कारण चाँद आसमान से हिल नहीं सकता और कुमुदनी आसमान में जा नहीं सकती! फिर? कुमुदनी के प्राण का अधार पानी चाँद की परछाई के लिए जगह बनाता है। यहीं प्रेम का मन भौतिक स्थिति... Keywords: कोलख्यान; kolkhyan; hindi; प्रेम Downloads: 13 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | प्रफुल्ल कोलख्यान की तीन कविताएँ - प्रफुल्ल कोलख्यान सचमुच एक दुर्लभ दृश्य है स्तनपान कराती हुई माता को देखना जब मैंने आर्टगैलरी में एक ऐसी ही पेंटिंग पर मुग्ध होते विदेशी को देखा तो महसूस किया Keywords: kolkhyan,कोलख्यान,कविता; kavitayen Downloads: 25 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | चिढ़ का चौताल - प्रफुल्ल कोलख्यान चिढ़ना व्यक्तिगत भी होता है और सामाजिक, सामुदायिक, दलीय भी। सुना है, मिथिलांचल के एक गांव के निवासी ‘चटनी-पापड़’ कहने से बुरी तरह चिढ़ते हैं। एक सज्जन बड़े लजालू ढंग से बता रहे थे कि उनके मुहल्... Keywords: कोलख्यान; हिंदी; kolkhyan Downloads: 9 |  |
![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | जी हाँ... मैं लिखता हूँ... दुख पर काबू पाने के लिए - प्रफुल्ल कोलख्यान समग्र और वास्तविक दुख या सुख कभी भी व्यक्तिगत मामला नहीं हुआ करता है। दुख और सुख हमारे सामाजिक जीवन का ही व्यक्त्विगत सारांश होता है। दुख है कि आज भी जिधर अन्याय है, उधर ही शक्ति है; बल्कि यह कि ... Keywords: कोलख्यान; हिंदी; hindi; kolkhyan Downloads: 10 |  |
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![[texts]](/images/mediatype_texts.gif) | सभ्यता फिर भी उम्मीद से है - प्रफुल्ल कोलख्यान बाजारवाद मछली के ही तेल में मछली को भुनने की कारीगरी जानता है। मकरजाल की तरह ‘मनुख-जाल’ उपभोक्ता मन के भीतर से पैदा होता है। …बाजारवाद की मनोरंजक संस्कृति हँसते-हँसाते मनुष्य की प्रतिरोध क्ष... Keywords: कोलख्यान; सभ्यता; बाजारवाद; kolkhyan Downloads: 22 |  |
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